KAUSHAL PANDEY (Astrologer)

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सबसे बड़ा धर्म -माता पिता की सेवा करना . कौशल पाण्डेय 09968550003

Posted On: 9 Dec, 2011 Others में

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सबसे बड़ा धर्म -माता पिता की सेवा करना
भारत वर्ष में एक से बढ़कर एक जीवात्मा पैदा हुए है ,भारत की मिटटी में जन्म लेना ही इश्वर की बहुत बड़ी कृपा है ,लेकिन इस धराधाम में जिसने जन्म लेकर भी कुछ पुण्य नहीं कमाया उसका जीवन पशु के सामान है , भारत की मिटटी में जन्म लेने के लिए देवता भी कितने जप तप करते है , लेकिन आज के समाज में कोई किसी का नहीं है , उसे सिर्फ अपने सुख से मतलब है , जिस मिटटी में जन्म लिया है उसी को आज बेच रहे है , जिस माँ ने नौ महीने अपने गर्भ में पाला है आज वो दर -दर की ठोकरे खा रही है .. वेदों में कहा गया है की -|पिता धर्म है ,पिता स्वर्ग है तथा पिता ही तप है ,आज भारतीय युवाओं के पास अपने बुजुर्गों के लिए समय नहीं है |जबकि भारतीय समाज में माता-पिता की सेवा को समस्त धर्मों का सार है |समस्त धर्मों में पुण्यतम् कर्म :माता-पिता की सेवा ही है ,पाँच महायज्ञों में भी माता -पिता की सेवा को सबसे अधिक महत्व प्रदान किया है पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं |माता में सभी तीर्थ विद्यमान होते हैं |जो संतान अपने माता -पिता को प्रसन्न एवम संतुष्ट करता है उसे गंगा स्नान का फल प्राप्त होता है |जो माता -पिता की प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा समस्त पृथ्वी कीप्रदक्षिणा हो जाती है |जो नित्य माता -पिता को प्रणाम करता है उसे अक्षय सुख प्राप्त होता है |जब तक माता -पिता की चरण रज पुत्र के मस्तक पर लगी रहती है तब तक वह शुद्ध एवम पवित्र रहता है |माता पिता का आशीर्वाद न हो तो हम जीवन में कभी भी सफल नहीं हो सकते है.
आज भी भारतीय समाज में श्रवण कुमार का नाम आदर से लिया जाता है, स्वय भागवान श्री राम अपने पिता की प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए चौदह वर्ष वन में रहे .
संतान के पालन – पोषण में माता का सर्वाधिक कार्य होता है, मॉ संतान के प्रत्येक सुख-दुःख का ध्यान रखती है ,पिता को परिवार को संचालित करने के लिए व्यवस्था तथा भविष्य की व्यवस्था केलिए अपने कर्तव्य कार्य मजूदरी मेहनत करना होती है ।
जो पुत्र अपने रोगी , जीविकाहीन एवम अपाहिज माता पिता को त्याग देता है , वो अपने कई जन्मो के पुण्य को नस्ट कर देता है |माता -पिता का अनादर करने पर उसके समस्त पुण्य क्षीण हो जाते हैं | जो मनुष्य अपने माता -पिता की अवज्ञा करता है वह महा प्रलय तक नरक में निवास करता है वो चाहे कितने व्रत पूजा पाठ करले उसके पापों का प्राश्चित नहीं हो सकता है ,जो अपने माता पिता को वृद्धाश्रमों में भेजते हैं, जो उन्हें बोझ समझते हैं कि वह कभी भी सुख नहीं पा सकते।रोगिणं चापि वृधंच पितरम वृत्ति कर्शितं |विकलं नेत्र कर्णाभ्याम त्यक्त्वा ग्च्झेच्च रौरवं ||
ज्योतिष शास्त्र में भी मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।
इस ऋण को ही आज कल के ज्योतिषियों ने कालशर्प दोष का नाम दे दिया है जबकि वास्तव में ये पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण है .
इसलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर ला दिया। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है।जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।
भागवत में एक कथा के अनुसार एक राजा हुए नाम था उनका चित्रकेतु, राजा चित्रकेतु के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो जाती है। इकलौते पुत्र की मृत्यु से चित्रकेतु को गहरा आघात पहुंचता है। उस समय देवर्षि नारद चित्रकेतु को वैराग्य का उपदेश देते हैं। नारदजी ने बताया राजन पुत्र चार प्रकार के होते हैं- शत्रु पुत्र, ऋणानुबंध पुत्र, उदासीन और सेवा पुत्र।
शत्रु पुत्र: जो पुत्र माता-पिता को कष्ट देते हैं, कटु वचन बोलते हैं और उन्हें रुलाते हैं, शत्रुओं सा कार्य करते हैं वे शत्रु पुत्र कहलाते हैं।
ऋणानुबंध पुत्र: पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार शेष रह गए अपने ऋण आदि को पूर्ण करने के लिए जो पुत्र जन्म लेता है वे ऋणानुबंध पुत्र कहलाते हैं।
उदासीन पुत्र: जो पुत्र माता-पिता से किसी प्रकार के लेन-देन की अपेक्षा न रखते विवाह के बाद उनसे विमुख हो जाए, उनका ध्यान ना रखे, वे उदासीन पुत्र कहलाते हैं।
सेवा पुत्र: जो पुत्र माता-पिता की सेवा करता है, माता-पिता का ध्यान रखते हैं, उन्हें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं होने देते, ऐसे पुत्र सेवा पुत्र अर्थात् धर्म पुत्र कहलाते हैं। नारदजी कहते हैं कि मनुष्य का वास्तविक संबंध किसी से नहीं होता। इसलिए आत्मचिंतन में रमना ही उसका परम कर्तव्य है।
भारतीय संस्कृति में माता-पिता का ऋण कोई संतान नही उतार पाती है लेकिन प्रत्येक संतान यही प्रयास करता है कि माता -पिता को हम अच्छी सेवा करें उन्हे सम्मान से जीने केलिए ऐसी व्यवस्था बनायें । जब तक संतान स्वंय माता-पिता नही बन जाता है जब तक वह माता-पिता के दायित्य को नही समझ पाते हे

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Manoj Mishra के द्वारा
14/12/2011

wah kaushal ji aapne apne bharatvars ke yuvayo ke liye bahut badi baat kahi hai aapka yah prayas safal ho

abodhbaalak के द्वारा
10/12/2011

कुशल जी किसे इंकार है इस बात से लेकिन आजके युग में प्रैक्टिकल में ऐसा हो नहीं रा है है http://abodhbaalak.jagranjunction.com/


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