KAUSHAL PANDEY (Astrologer)

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बुजुर्गों की सेवा करने से देव गुरु मानव जीवन में शुभ फल देते है :- पंडित कौशल पाण्डेय 09968550003

Posted On: 11 Sep, 2012 में

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बुजुर्गों की सेवा करने से देव गुरु मानव जीवन में शुभ फल देते है :- पंडित कौशल पाण्डेय

दोस्तों आप सभी को एक बहुत ही सरल उपाय बता रहा हूँ ज्योतिष में गुरु को पितामह की उपाधि दी गई है ,और जिनके कुंडली में गुरु अशुभ हो वो सिर्फ धर्म स्थान और बुजुर्गों की सेवा करे गुरु कभी अशुभ फल नहीं देगा , ज्योतिष में बृहस्पति धनु और मीन राशी के स्वामी है और कर्क राशी में शुभ और मकर राशी में अशुभ फल देते है , गुरु के सूर्य, मंगल, चंद्र मित्र व शुक्र, बुध शत्रु तथा शनि, राहु, केतु सम हैं। कुण्डली में बृहस्पति से पंचम, सप्तम और नवम भावों पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है , देव गुरु बृहस्पति कर्क, धनु, मीन राशियों तथा केंद्र 1,4,7,10 या त्रिकोण 5,9 भावों में स्थित होने पर शुभ फल देने वाला और योगकारक कहा गया है .

बृहस्पति का राशि फल :-
जन्म कुंडली में गुरु का मेषादि राशियों में स्थित होने का फल इस प्रकार है :-
मेष में – गुरु हो तो जातक तर्क वितर्क करने वाला , किसी से न दबने वाला ,सात्विक,धनी,कार्य क्षेत्र में विख्यात,क्षमाशील ,पुत्रवान,बलवान,प्रतिभाशाली,तेजस्वी,अधिक शत्रु वाला,बहु व्ययी ,दंडनायक व तीक्ष्ण स्वभाव का होता है |
वृष में गुरु हो तो जातक वस्त्र अलंकार प्रेमी ,विशाल देह वाला ,देव –ब्राह्मण –गौ भक्त, प्रचारक ,सौभाग्यशाली,अपनी स्त्री में ही आसक्त ,सुन्दर कृषि व गौ धन युक्त, वैद्यक क्रिया में कुशल ,मनोहर वाणी-बुद्धि व गुणों से युक्त ,विनम्र तथा नीतिकुशल होता है
मिथुन में गुरु हो तो जातक ,विज्ञान विशारद ,बुद्धिमान,सुनयनी,वक्ता,सरल,निपुण,धर्मात्मा ,मान्य ,गुरुजनों व बंधुओं से सत्कृत होता है |
कर्क में गुरु हो तो जातक विद्वान,सुरूप देह युक्त ,ज्ञानवान ,धार्मिक, सत्य स्वभाव वाला,यशस्वी ,अन्न संग्रही ,कोषाध्यक्ष,स्थिर पुत्र वाला,संसार में पूज्य ,विशिष्ट कर्मा तथा मित्रों में आसक्त होता है |
सिंह में गुरु हो तो जातक स्थिर शत्रुता वाला ,धीर ,विद्वान,शिष्ट परिजनों से युक्त,राजा या उसके तुल्य,पुरुषार्थी,सभा में लक्ष्य ,क्रोध से समस्त शत्रुओं को जीतने वाला ,सुदृढ़ शरीर का ,वन-पर्वत आदि के भ्रमण में रूचि रखने वाला होता है |
कन्या में गुरु हो तो जातक मेधावी, धार्मिक ,कार्यकुशल ,गंध –पुष्प-वस्त्र प्रेमी ,कार्यों में स्थिर, शास्त्रज्ञान व शिल्प कार्य से धनी दानी ,सुशील चतुर ,अनेक भाषाओं का ज्ञाता तथा धनी होता है |
तुला मे गुरु हो तो जातक मेधावी ,पुत्रवान,विदेश भ्रमण से धनी विनीत ,आभूषण प्रिय ,नृत्य व नाटक से धन संग्रह करने वाला ,सुन्दर ,अपने सह व्यापारियों में बड़ा,पंडित,देव अतिथि का पूजन करने वाला होता है |
वृश्चिक में गुरु हो तो जातक अधिक शास्त्रों में चतुर , क्षमाशील, नृपति, ग्रंथों का भाष्य करने वाला ,निपुण ,देव मंदिर व नगर में कार्य करने वाला , सद्स्त्रीवान,अल्प पुत्र वाला ,रोग से पीड़ित ,अधिक श्रम करने वाला ,क्रोधी, धर्म में पाखण्ड करने वाला व निंद्य आचरण वाला होता है |
धनु में गुरु हो तो जातक आचार्य ,स्थिर धनी ,दाता , मित्रों का शुभ करने वाला ,परोपकारी ,शास्त्र में तत्पर ,मंत्री या सचिव ,अनेक देशों का भ्रमण करने वाला तथा तीर्थ सेवन में रूचि रखने वाला होता है |मकर में गुरु हो तो जातक अल्प बलि ,अधिक मेहनत करने वाला ,क्लेश धारक,नीच आचरण करने वाला ,मूर्ख ,निर्धन , दूसरों की नौकरी करने वाला , दया –धर्म –प्रेम –पवित्रता –स्व बन्धु व मंगल से रहित ,दुर्बल देह वाला ,डरपोक,प्रवासी,व विषाद युक्त होता है |
कुम्भ में गुरु हो तो जातक चुगलखोर ,असाधु ,निंद्य कार्यों में तत्पर ,नीच जन सेवी ,पापी,लोभी ,रोगी ,अपने वचनों के दोष से अपने धन का नाशक ,बुद्धिहीन व गुरु की स्त्री में आसक्त होता है |
मीन में गुरु हो तो जातक वेदार्थ शास्त्र वेत्ता ,मित्र व सज्जनों द्वारा पूजनीय ,राज मंत्री ,प्रशंसा प्राप्त करने वाला ,धनी ,निडर ,गर्वीला, स्थिर कार्यारम्भ करने वाला ,शांतिप्रिय ,विख्यात ,नीति व व्यवहार को जानने वाला होता है |
(गुरु पर किसी अन्य ग्रह कि युति या दृष्टि के प्रभाव से उपरोक्त राशि फल में परिवर्तन भी संभव है| )
गुरु का सामान्य दशा फल
जन्म कुंडली में गुरु स्व ,मित्र ,उच्च राशि -नवांश का ,शुभ भावाधिपति ,षड्बली ,शुभ युक्त -दृष्ट हो तो गुरु की शुभ दशा में,यश प्राप्ति,वाणी में प्रभाव व अधिकार, बुध्धि कि प्रखरता,विद्या लाभ,परीक्षाओं में सफलता,सुख-सौभाग्य ,राज कृपा ,मनोरथ सिध्धि ,दान पुण्य –तीर्थ भ्रमण आदि धार्मिक कार्यों में रूचि ,प्रभुत्व प्राप्ति, विवाह ,संतान सुख , स्वर्ण आभूषण की प्राप्ति ,सत्संग सात्विक गुणों की वृद्धि,मिष्टान भोजन की प्राप्ति ,व्यापार में लाभ ,स्वाध्याय में रूचि,पद प्राप्ति व पदोन्नति होती है | अध्यापन ,न्याय सेवा ,बैंकिंग ,प्रबंधन व धार्मिक प्रवचनों से सम्बंधित क्षेत्रों में सफलता मिलती है |राजनीतिक व प्रशासनिक पद की प्राप्ति होती है |ईशान दिशा से लाभ होता है | शहद ,तगर ,जटामांसी ,मोम , घी व पीले रंग के पदार्थों के व्यापार में लाभ होता है | जिस भाव का स्वामी गुरु होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है |
यदि गुरु अस्त ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति पाप युक्त दृष्ट हो तो गुरु दशा में शरीर में सूजन ,शोक ,कर्ण रोग ,गठिया,राजा से भय ,स्थान हानि ,अपवित्रता ,विद्या प्राप्ति में बाधा ,स्मरणशक्ति में कमी ,गुरु जनों व ब्राह्मणों से द्वेष ,गुरु के कारकत्व वाले पदार्थों से हानि ,संतान प्राप्ति में बाधा या कष्ट ,मान हानि ,संचित धन की हानि होती है | जिस भाव का स्वामी गुरु होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है |
गोचर में बृहस्पति
जन्म या नाम राशि से 2,5,7,9, व 11 वें स्थान पर गुरु शुभ फल देता है |शेष स्थानों पर गुरु का भ्रमण अशुभ कारक होता है |
जन्मकालीन चन्द्र से प्रथम स्थान पर गुरु का गोचर मान हानि ,व्यवसाय में बाधा,राजभय ,मानसिक व्यथा ,कार्यों में विलम्ब,सुख में कमी तथा भारी व्यय से आर्थिक स्थिति को कमजोर करता है |
दूसरे स्थान पर गुरु का गोचर धन लाभ ,परिवार में सुख समृद्धि, विवाह ,संतान प्राप्ति , शत्रु को हानि ,दान व परोपकार में रूचि ,चल संपत्ति में वृद्धि करता है |
तीसरे स्थान पर गुरु का गोचर शरीर पीड़ा ,सम्बन्धियों से झगडा ,राज्य से भय ,मित्र का अनिष्ट ,यात्रा में हानि तथा व्यवसाय में बाधा देता है |
चौथे स्थान पर गुरु का गोचर मानसिक अशांति ,शत्रु से कष्ट, जमीन जायदाद की हानि ,माता को कष्ट तथा स्थान परिवर्तन करता है |
पांचवें स्थान पर गुरु का गोचर शिक्षा में सफलता ,संतान सुख ,पद लाभ ,पदोन्नति ,हर काम में सफलता ,सट्टे या शेयर मार्किट में लाभ प्रदान करता है |
छ्टे स्थान पर गुरु का गोचर रोग ,राज्य से विरोध,संतान से कष्ट ,दुर्घटना का भय तथा विवाद से हानि करता है |
सातवें स्थान पर गुरु के गोचर से विवाह एवम दाम्पत्य सुख की प्राप्ति , आरोग्यता , दान पुण्य व तीर्थ यात्रा में रूचि ,व्यवसाय व्यापार में लाभ तथा यात्रा में लाभ होता है |
आठवें स्थान पर गुरु के गोचर से रोग,बंधन ,चोर या राज्य से कष्ट ,धन हानि ,संतान को कष्ट तथा कफ विकार होता है |
नवें स्थान पर गुरु के गोचर से भाग्य वृद्धि ,धार्मिक यात्रा ,संतान सुख ,यश मान की प्राप्ति ,सफलता .आर्थिक लाभ तथा आध्यात्मिक विचारों का श्रवण होता है |
दसवें स्थान पर गुरु के गोचर से मान हानि ,दीनता ,व्यवसाय में बाधा व धन हानि होती है |
ग्यारहवें स्थान पर गुरु के गोचर से धन व प्रतिष्ठा की वृद्धि ,विवाह,संतान सुख ,पद लाभ व पदोन्नति ,व्यापार में लाभ ,वाहन सुख ,भोग विलास के साधनों की वृद्धि व सभी कार्यों में सफलता मिलती है |
बारहवें स्थान पर गुरु के गोचर से आर्थिक हानि ,व्यय में वृद्धि ,अस्वस्थता ,संतान कष्ट , मिथ्या आरोप लगने का भय होता है |
( गोचर में गुरु के उच्च ,स्व मित्र,शत्रु नीच आदि राशियों में स्थित होने पर , अन्य ग्रहों से युति ,दृष्टि के प्रभाव से , अष्टकवर्ग फल से या वेध स्थान पर शुभाशुभ ग्रह होने पर उपरोक्त गोचर फल में परिवर्तन संभव है |
कुंडली में गुरु के अशुभ के लक्षण : -
सिर पर चोटी के स्थान से बाल उड़ जाते हैं। गले में व्यक्ति माला पहनने की आदत डाल लेता है। सोना खो जाए या चोरी हो जाए। बिना कारण शिक्षा रुक जाए। व्यक्ति के संबंध में व्यर्थ की अफवाहें उड़ाई जाती हैं। आंखों में तकलीफ होना, मकान और मशीनों की खराबी, अनावश्यक दुश्मन पैदा होना, धोखा होना, सांप के सपने। सांस या फेफड़े की बीमारी, गले में दर्द। 2, 5, 9, 12वें भाव में बृहस्पति के शत्रु ग्रह हों या शत्रु ग्रह उसके साथ हों तो बृहस्पति मंदा होता है।
जनम कुंडली में गुरु अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे -आठवें -बारहवें भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो ऊँचाई से पतन , शरीर में चर्बी की वृद्धि ,कफ विकार ,मूर्च्छा ,हर्निया,कान के रोग ,स्मृति विकार , जिगर के रोग ,मानसिक तनाव , रक्त धमनी से सम्बंधित रोग करता है |

शुभ के लक्षण:-
व्यक्ति कभी झूठ नहीं बोलता। उनकी सच्चाई के लिए वह प्रसिद्ध होता है। आंखों में चमक और चेहरे पर तेज होता है। अपने ज्ञान के बल पर दुनिया को झुकाने की ताकत रखने वाले ऐसे व्यक्ति के प्रशंसक और हितैषी बहुत होते हैं। यदि बृहस्पति उसकी उच्च राशि के अलावा 2, 5, 9, 12 में हो तो शुभ।
बृहस्पति शान्ति के उपाय
जन्मकालीन गुरु निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
रत्न धारण – पीत रंग का पुखराज सोने या चांदी की अंगूठी मेंपुनर्वसु ,विशाखा ,पूर्व भाद्रपद नक्षत्रों में जड़वा कर गुरुवार को सूर्योदय के बाद पुरुष दायें हाथ की तथा स्त्री बाएं हाथ की तर्जनी अंगुली में धारण करें |
धारण करने से पहले ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र के १०८ उच्चारण से इस में ग्रह प्रतिष्ठा करके धूप,दीप , पीले पुष्प, हल्दी ,अक्षत आदि से पूजन कर लें |पुखराज की सामर्थ्य न हो तो उपरत्न सुनैला या पीला जरकन भी धारण कर सकते हैं | केले की जड़ गुरु पुष्य योग में धारण करें |
दान व्रत ,जाप – गुरूवार के नमक रहित व्रत रखें , ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सःगुरुवे नमः मन्त्र का १९००० की संख्या में जाप करें | गुरूवार को घी, हल्दी, चने की दाल ,बेसन पपीता ,पीत रंग का वस्त्र ,स्वर्ण, इत्यादि का दान करें |
फलदार पेड़ सार्वजनिक स्थल पर लगाने से या ब्राह्मण विद्यार्थी को भोजन करा कर दक्षिणा देने से भी बृहस्पति प्रसन्न हो कर शुभ फल देते हैं |
इनकी शान्ति के लिये वैदिक मन्त्र-
‘ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु।
यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥’,

पौराणिक मन्त्र :-
‘देवानां च ऋषीणां च गुरुं कांचनसंनिभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥’,

बीज मन्त्र :-
बीज मन्त्र-’ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम:।’

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